स्टार कास्ट: अक्षय कुमार, राधिका आप्टे, सोनम कपूर

डायरेक्टर: आर. बाल्की

रेटिंग: ****

सैनेटरी पैड और पीरियड जैसे मुद्दे पर तो लोग बात तक नहीं करना चाहते. अबतक हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड तक किसी ने भी इस विषय पर फिल्म बनाने की बात सोची तक नहीं लेकिन ये हिम्मत अक्षय कुमार ने दिखाई. एक बड़े स्टार के लिए ऐसा विषय चुनना बहुत मुश्किल है जिसका नाम लेते ही लोग नज़रें चुराने लगते हैं. जब लोग देखेंगे और सुनेंगे ही नहीं तो समझेंगे कैसे. लेकिन इस फिल्म के जरिए अक्षय कुमार अपनी बात दर्शकों तक आसान भाषा में पहुंचाने में कामयाब रहे हैं. फिल्म आने से पहले इसे लेकर दो डर थे- पहला कि कहीं ये बहुत फिल्मी ना हो जाए और दूसरा कि कहीं इसे डॉक्यूमेंट्री जैसी ना बना दें. लेकिन फिल्म देखने के बाद ये कहा जा सकता कि ये फिल्म गेम चेंजर भी साबित होने वाली है क्योंकि इसके बाद पीरियड्स और सैनेटरी पैड जैसे शब्दों को लेकर लोगों की राय बदलने वाली है. अब लोग कम से कम इस पर बात करने से तो नहीं हिचकिचाएंगे.

ये फिल्म तमिलनाडु के रहने वाले अरूणाचलम मुरूगनाथम के ऊपर बनी है जिन्होंने सैनिटरी पैड बनाने वाली मशीन का आविष्कार किया. इनकी कहानी को अक्षय की पत्नी ट्विंकल खन्ना ने अपनी किताब में लिखी उसके बाद इस पर फिल्म बनाने के लिए उन्हें राजी किया. यहां पढ़ें असली पैडमैन की पूरी कहानी

कहानी

ये फिल्म मध्य प्रदेश के बैकग्राउंड में बनी है. इसमें साल 2001 के दौरान की कहानी दिखाई गई है. लक्ष्मीकांत चौहान (अक्षय कुमार) अपनी पत्नी से बेइंतहा मोहब्बत करता है. लोग प्यार से उसे लक्ष्मी बुलाते हैं. जैसे ही पता चलता है कि उसकी पत्नी गायत्री (राधिका आप्टे) अपने पीरियड्स (माहवारी) के दौरान गंदे कपड़ों का इस्तेमाल करती है तब वे इस बात को लेकर परेशान हो जाता है. गंदगी से कई बड़ी बीमारियां फैलती हैं और उसे इस बात की फिक्र है कि गायत्री को कुछ हो न जाए. फिर लक्ष्मी गायत्री को सैनेटरी पैड लाकर देता है लेकिन कीमत देखकर पत्नी इसे इस्तेमाल करने से मना कर देती है.

 
इसके बाद लक्ष्मी को आइडिया आता है कि इसे कम लागत में भी बनाया जा सकता है. बार-बार कोशिश करने पर भी वे वैसा पैड नहीं बना पाता जो कंपनियां बनाती हैं. फिर वे सैनेटरी पैड की मशीन बनाने की ठान लेता है. लेकिन इसके लिए उसे बड़ी कुर्बानी देनी पड़ती है. पत्नी, मां, बहन और समाज हर कोई उसके अस्तित्व को ही नकार देता है. लोगों को लक्ष्मी माहवारी की तरह ही 'गंदगी' लगने लगता है. IIT से आविष्कार के लिए अवॉर्ड जीतने पर लोग उसकी तस्वीर देखकर खुश तो होते हैं लेकिन अगले ही पल जब देखते हैं कि ये सम्मान पैड के लिए मिला है तब उसे दुत्कारते भी हैं और लानत भरी नज़रों से देखते हैं. लेकिन वो हौसला नहीं हारता और लगातार डटा रहता है. इसके बाद अचानक उसकी ज़िंदगी में परी (सोनम कपूर) की एंट्री होती है और वो उसकी प्रेरणा बन जाती है. पैड के इस्तेमाल जैसी जिस छोटी सी बात को लक्ष्मी औरतों को नहीं समझा पाता वो परी चुटकियों में कर देती है और फिर जो सिलसिला चलता है वो थमने का नाम नहीं लेता है. लेकिन अब भी उसका परिवार उसे गलत ही मानता है. उसे यूएन (यूनाइटेड नेशंस) में स्पीच देने के लिए बुलाया जाता और वहां पर लक्ष्मी जो बोलता है वो बातें सुनने वालों के दिल में उतर जाती हैं. लक्ष्मी टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में कहता है- 'जब आपकी मां, बहन और बेटी मजबूत होती हैं तब देश मजबूत होता है.' ये एक लाइन बहुत बड़ा संदेश देती है.

एक्टिंग

अक्षय कुमार ने पैडमैन की भूमिका को बहुत ही सहजता ने निभाया है. इस रोल को जीवंत करने के लिए वे फिल्म में पैंटी और पैड तक पहन लेते हैं. जब कोई उनकी बात नहीं समझता तब उनके चेहरे पर मजबूरी दिखाई देती है. उन्हें देखकर ये कहा जा सकता है कि इस रोल को उनसे बेहतर शायद ही कोई निभा सकता था. ऐसा इसलिए भी क्योंकि इस तरह का चुनौतीपूर्ण रोल करना हर किसी के बस की बात भी नहीं है. पर्दे पर ज़्यादातर एक्टर्स एक्शन और रोमांस ही करना चाहते हैं. कोई ऐसे सामाजिक मुद्दों पर फिल्म नहीं बनाना चाहता क्योंकि उनकी छवि का सवाल होता है. लेकिन ये फिल्म करके अक्षय कुमार हीरो से सुपरहीरो बन गए हैं. इससे पहले भी उन्होंने 'टॉयलेट एक प्रेम कथा' को चुना और लोगों ने उसे भी देखा. इस फिल्म के साथ अक्षय ने बिना कुछ कहे बॉलीवुड सुपरस्टार्स को ये संदेश भी दिया है कि वास्तविक मुद्दों पर भी इंटरटेनिंग फिल्में बनाई जा सकती हैं. साथ ही, अब स्टारडम बनाए रखने के लिए ज़रूरी है कि आप दर्शकों को कुछ नया दें और एक्सपेरिमेंट करते रहें.

Source : Agency