नई दिल्ली

खरीफ की फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित करने के बाद पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पंजाब में रैली करने जा रहे हैं. मुक्तसर के मलोट की इस रैली के जरिए पीएम मोदी की नजर मुख्य तौर पर किसानों पर रहेगी. मोदी की यह रैली भले ही 'किसान कल्याण रैली' के तौर पर पेश की जा रही हो, लेकिन इसके कुछ राजनीतिक मायने भी हैं.

दरअसल, दक्षिणी पंजाब के मलोट में मोदी के रैली करने का उद्देश्य बीजेपी के लिए पंजाब में किसान वोट बैंक हासिल करना है. क्योंकि सरकार द्वारा हाल ही में एमएसपी को लेकर की गई घोषणा के बाद यदि किसी राज्य के किसानों को सबसे ज्यादा फायदा होगा तो वो पंजाब के किसान हैं.

आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो पंजाब में पैदा होने वाले धान और गेहूं का 90 फीसदी हिस्सा सरकारी क्रय केंद्रों पर खरीदा जाता है. ऐसे में हाल ही में एमएसपी को लेकर हुई घोषणाओं का सीधा असर यहां के किसान वोट बैंक पर दिखेगा. एमएसपी को लेकर सरकार की घोषणा का फायदा उन्हीं इलाकों में किसानों को मिलने जा रहा है, जहां उनकी उपज सीधे सरकारी क्रय केंद्रों में जाती है.

कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक देश में होने वाले गेहूं और धान की कुल उपज का केवल 35 फीसदी ही सरकारी क्रय केंद्रों में जाता है. दलहन और तिलहन के मामले में तो यह औसत और भी खराब होकर 20-25 फीसदी पर ठहर जाता है. पंजाब में बेस्ट क्वालिटी का खाद्यान्न उत्पादन होने की वजह से यहां का अधिकतर अनाज सरकारी क्रय केंद्रों पर खरीद लिया जाता है.

पंजाब के अलावा इन राज्यों पर भी है नजर

इसके अलावा पीएम मोदी 'किसान कल्याण रैली' के जरिये मोदी पंजाब, हरियाणा व राजस्थान के किसानों पर भी निशाना साधेंगे. इसके पीछे वजह है 2019 में होने वाले लोकसभा और विधासनभा चुनाव.

बता दें कि 2019 में लोस चुनाव के साथ हरियाणा में विधानसभा चुनाव भी हैं. इससे पहले राजस्थान में विधानसभा चुनाव होंगे. ऐसे में इस रैली में केंद्र व प्रदेश के भाजपा-अकाली नेता किसान वोट बैंक हासिल करने की कोशिश करेंगे.

किसानों की आय दोगुनी करना इसलिए है चुनौती

गौरतलब है कि मोदी सरकार ने देश में किसानों की आमदनी को 2022 तक दोगुना करने का लक्ष्य रखा है. इस लक्ष्य तक पहुंचने की कोशिश सरकार ने 2015 में शुरू कर दी होती तो 2022 तक किसानों की वार्षिक आमदनी में लगातार 7 वर्षों तक 12 फीसदी का इजाफा होता और तय लक्ष्य प्राप्त कर लिया जाता, लेकिन ऐसा हो नहीं सका.

2015 में बजट सत्र के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों की आमदनी को सात साल में दोगुना करने का वादा किया था. इसके बाद पेश हुए सभी केंद्रीय बजटों में इस वादे को दोहराया गया. लेकिन 2022 के लक्ष्य से बंधे इस वादे को पूरा करने की लिए तीन साल तक सरकार ने अपना रोडमैप नहीं बनाया. बीते तीन साल तक की कृषि क्षेत्र की स्थिति को देखते हुए लगता है कि दिए गए समय में इस लक्ष्य को पाना केंद्र सरकार के लिए मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है.

केंद्र सरकार ने इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अशोक दलवई की अध्यक्षता में एक अंतर मंत्रालयी समिति का गठन किया. इस समिति ने बीते दो साल के दौरान देश के कृषि क्षेत्र का सघन अध्ययन करते हुए अपनी रिपोर्ट तैयार की है. इस रिपोर्ट पर फिलहाल मंत्रालय ने जनता का सुझाव मांगा है जिसके बाद उम्मीद है कि वह अपनी रिपोर्ट पूरी करते हुए केंद्र सरकार को किसानों की आमदनी दोगुनी करने के फॉर्मूले पर सिफारिश पेश कर दे.

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