कवर्धा
कलेक्टर एवं जिला दण्डाधिकारी श्री अवनीश कुमार शरण ने उच्च न्यायालय बिलासपुर एवं शासन के निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करते हुए ध्वनि प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण के लिए आवश्यक दिशा निर्देश जारी किये है। इस संबंध में पुलिस अधीक्षक, सभी अनुविभागीय अधिकारी राजस्व, सभी तहसीलदार एवं सभी थाना प्रभारियों को परिपत्र जारी कर ध्वनि प्रदूषण की रोकथाम के निर्देश दिए है। परिपत्र में उच्च न्यायालय बिलासपुर के आदेश के परिपालन में लेख है कि ध्वनि प्रदूषण के संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों एवं पर्यावरण एवं वन मंत्रालय भारत सरकार द्वारा ध्वनि प्रदूषण एवं नियंत्रण नियम 2000 ध्वनि प्रदूषण एवं विनिमय एवं नियंत्रण 2010 में ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण एवं विस्तारकांे के प्रयोग पर आवश्यक नियंत्रण हेतु दिशा निर्देश जारी किए गए हैं। इसके अनुसार- लाउडस्पीकर या ध्वनि विस्तारक यंत्र या अन्य ध्वनि उत्पन्न करने वाले यंत्र का उपयोग सार्वजनिक स्थल पर किया जा रहा हो तो उसकी सीमा उस क्षेत्र के पैमाने से 10 डी.बी.(ए) से अधिक नहीं होना चाहिए या 75 डी.बी.(ए) से अधिक नहीं इनमें से जो भी कम है, से अधिक होना चाहिए। लाउडस्पीकर या माइक सेट का उपयोग बिना जिलादंडाधिकारी या अन्य सक्षम अधिकारी की अनुमति के बिना ना किया जाए। रात 10 से 6 बजे के मध्य किसी को भी ध्वनि विस्तारक यंत्र ड्रप या टॉम-टॉम या ट्रमपैट पीटने या ध्वनि उत्पन्न करने वाले किसी भी यंत्र के उपयोग की अनुमति नहीं दी जा सकती।

अति संवेदनशील क्षेत्रों में जैसे अस्पताल, शिक्षण संस्था, अदालत, धर्म संस्थान के कम से कम 100 मीटर दूरी तक पटाखे ना फोड़ा जाए। इसी प्रकार इन में मीटर की दूरी तक प्रेशर हार्न म्यूजिकल या अन्य किसी भी प्रकार की एंपलीफायर का उपयोग प्रतिबंधित है। किसी निजी उपयोग किस स्थान की सीमा पर यदि किसी व्यक्ति द्वारा अपने निजी ध्वनि यंत्र का उपयोग किया जा रहा है उसकी सीमा क्षेत्र के लिए निर्धारित परिवेशीय वायु गुणवत्ता सीमा से पांच डीबीए से अधिक नहीं होना चाहिए। आवासीय क्षेत्रों में रात 10 बजे से सुबह 6 बजे के बीच वाहनों की हॉर्न का उपयोग नहीं किया जा सकेगा। सभी विकास एवं निर्माण संस्थाएं, स्थानीय संस्थएं एवं अन्य संबंधित विभाग, प्रगति एवं विकास हेतु की जाने वाली विभिन्न गतिविधियों के दौरान ध्वनि प्रदूषण की निर्धारित सीमाओं का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करें। ध्वनि प्रदूषण पर रोकथाम हेतु प्रधिकृत अधिकारी जिसका की नामांकन राज्य शासन द्वारा किया जाता है, (जो कि किसी भी जिले का डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, पुलिस कमिश्नर या ऐसा अधिकारी जो कि डीएसपी के नीचे का स्तर न हो) वायु (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम 1981 में 1987 में किए गए संशोधन में वायु प्रदूषण की परिभाषा में शोर को भी सम्मिलित किया गया है। अतः वायु  अधिनियम के प्रावधान ध्वनि प्रदूषण के संबंध में भी लागू करने योग्य है। भारतीय दंड संहिता की धारा 268, 290 एवं 291 ध्वनि प्रदूषण से संबंधित है, तथा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 133 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट को ध्विनि प्रदूषण नियंत्रित करने हेतु अधिकार सौपे गए हैं। इस कार्यक्रम में जिला स्तर से स्थानीय समाचार पत्र स्थानीय, टीवी चैनल, एनजीओ, स्वयंसेवी संस्थाएं जैसे रोटरी क्लब लायंस क्लब आदि की भी सहायता लेकर जन जागरूकता चला लेने की आवश्यकता होगी। ध्वनि प्रदूषण के दुष्प्रभाव की रोकथाम हेतु स्थानीय शिक्षण संस्थाओं धार्मिक संगठनों आदि सम्मिलित करते हुए सकारात्मक कार्रवाई की जाए ताकि ध्वनि प्रदूषण के नियंत्रण अधिकारी को निर्देशित किया जाकर यातायात परिवहन विभाग की सहायता ध्वनि प्रदूषण नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए।

Source : Agency