रायपुर
बीते तीन चुनाव में हार झेल चुकी छत्तीसगढ़ कांग्रेस इस बार अदद एक जीत के लिए जोर-आजमाइश कर रही है, लेकिन बनते-बिगड़ते समीकरण ये बताने के लिए काफी है कि कांग्रेस में इस समय सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी बीते 15 सालों से सत्ता से बाहर है, लेकिन विधानसभा चुनाव 2018 में कांग्रेस हर हाल में सत्ता वापसी की राह तलाश रही है. बीते एक माह से कांग्रेस में मचे अंदरुनी घमासान के बीच कई तरह से समीकरण बदल और बिगड़ रहे हैं, जिसकी चिंता और डर आला कमान को सताने लगा है.

शायद यही वजह है कि चुनाव से ठीक पहले राहुल गांधी के निर्देश पर छत्तीसगढ़ कांग्रेस में 7 सदस्यीय कोर कमेटी का गठन किया गया है. जबकि इससे पहले समन्वय समिति और अनुशासन समिति सभी अहम जिम्मेदारियों में अपनी राय देती थी. कांग्रेस के संचार प्रमुख शैलेष नितिन त्रिवेदी का कहना है कि चुनाव से पहले नीतियों में परिवर्तन होता है. इसमें समीकरण बिगड़ने जैसी कोई बात नहीं है.

फिर भी चाहे एक मंत्री की कथित सेक्स सीडी मामले में पीसीसी चीफ भूपेश बघेल की जेल यात्रा हो या फिर कथित सीडी में सीटों की खरीद फरोख्त की बात. इन दोनों घटनाओं के बाद कांग्रेस के आला नेताओं ने बघेल से दूरी बनानी शुरू कर दी थी, जिसका ताजा उदाहरण कांग्रेसी नेताओं के मां दंतेश्वरी दर्शन में साफतौर पर दिखा, जहां भूपेश बघेल नदारद थे.

चूंकि अब चुनावी समर में कांग्रेस कोई बड़ा फेरबदल नहीं कर सकती. इसलिए कहा जा रहा है कि आज तक जो निर्णय भूपेश बघेल अकेले लिया करते थे, अब वह शक्ति सात नेताओं में बराबर बांट दी गई है, जिससे साफ है कि भूपेश बघेल को मिला फ्री-हैण्ड अब समाप्त हो चुका है. हालांकि कुछ नेता यह भी मानते हैं कि आला कमान ने बघेल के पर कतरने में थोड़ी देरी कर दी. जिसका खामयाजा उन्हें चुनाव में उठाना पड़ सकता है.

बहरहाल भूपेश बघेल को मिला फ्री-हैण्ड वापसी हो या फिर पर कतरने की बात. इससे कांग्रेस को धरातल पर क्या कुछ लाभ होगा यह तो आने वाला वक्त ही तय करेगा, मगर इतना तो तय है कि ऐन चुनाव वक्त में कांग्रेस में ऑल इज नॉट वेल की स्थिति बनी हुई है, जो घातक साबित हो सकती है.

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