सुदर्शन वीरेश्वर प्रसाद व्यास

 

          दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया में यदि कोई शब्द क्रांति का सकारात्मक परिचायक बना है, तो वह है ग्लोबल विलेज” या ग्लोबलाईजेशन...। हां ये बात और है कि 21वीं सदी के पहले दशक में ही इस शब्द ने अपनी सार्थकता सिद्ध की और इसका श्रेय जाता है इंटरनेट और खासकर सोशल मीडिया को। इसमें कोई अतिश्योंक्ति नहीं कि बीते ज़माने में देश के किसी कोने में घटित किसी घटना को जानने में 2 से 3 दिन लगते थे, लेकिन आज देश ही नहीं बल्कि दुनियां में घटित होने वाली घटना को हम लाईव अर्थात् सीधे तौर पर कहीं भी और किसी भी जगह आसानी से देख सकते हैं। सोशल मीडिया ने इस दुनिया को एकसूत्र में सिर्फ जोड़ा ही नहीं है, बल्कि एक परिवार के रूप में बांधा भी है। यकीनन, दुनिया को जब इंटरनेट की सुविधा मिली, तो कहा जाने लगा कि अब ग्लोबलाईजेशन का युग शुरू हो गया है। वही ग्लोबलाईजेशन जिसे भारतीय संस्कृति में वसुधैव कुटुंबकम्” के नाम से जाना जाता है और कहा जाता है कि :-  अयं वे नश्चक्राणां गणनां लघु चेतसां, उदारचरित्राणां तु वसुधैव कुटुंबकम्...लेकिन, इसे विडंबना ही कहे कि इंटरनेट के आने से महज़ सूचनाओं का ही आदान – प्रदान भर हो पाया। जैसे ही सोशल मीडिया का उदय हुआ ये उक्ति जैसे सच्चाई सी लगने लगी। समूचा विश्व एक परिवार की तरह लगने लगा।

          यकीनन, मौजूदां दौर में यदि किसी भी आंदोलन या अभियान को अपने चरम पर पहुंचाना हैं तो इसका ब्रह्मास्त्र है सोशल मीडिया...जिसमें अनगिनत भावनात्मक तंतुओं का मकड़जाल फैला हुआ है और उन्हीं तंतुओं में से एक है 'देशभक्ति'। यह भी यथार्थ है कि स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, राष्ट्रीय पर्व या किसी सैनिक की शहादत पर ही सोशल मीडिया पर देशभक्ति जागती है, जिसने असल में फैशन का रूप ले लिया है। राष्ट्रीय पर्व पर अपने प्रोफाइल पिक्चर को तिरंगे में रंगने का आंदोलन हो, किसी दुश्मन देश के खिलाफ़ अपना गुस्सा ज़ाहिर करने का तरीका हो, या किसी भी देशभक्ति से ओतप्रोत वायरल वीडियो को शेयर करने की बात, ये सभी कोशिशें ही अब देशभक्ति का प्रमाण - पत्र प्रदान कराती है।

           इस अकल्पनीय भूमिका में फेसबुक, व्हाट्सएप्प जैसी सोशल साइट्स मुख्य रूप से सोशल मीडिया के पूरक बने हैं। चाहे विषय वस्तु कैसी भी हो, लेकिन इन माध्यमों ने लोगों के दिलों दिमाग पर अपनी जड़ें पूरी तरह से कायम की है। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि इनका जन्म भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगता। एक सामान्य सा लड़का अपने दिलों – दिमाग में कुछ कर गुज़रने का सपना पाले बैठता है। वो असंभव सा सपना था सारी दुनिया के लोगों को एक मंच पर लाने का...। कई रुकावटों, परेशानियों के चलते वह अपने सपने को हकीकत बनाने में जुटा रहता है। उसके सपनों को पंख लगते ही हैं, कि कुछ खरीददार उन्हें खरीदने के लिए सपनों का सौदा करने लगते हैं। लेकिन उस लड़के के दिलों – दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा होता है और आखिरकार वह दुनिया को एक ऐसे मंच पर लाकर खड़ा करता है, जहां हर खास – ओ – आम अपनी बात अपने तरीके से खुले तौर पर रख सकता है। अपनी खुशी सारी दुनियां से ज़ाहिर कर सकता है, कोई भी अपना गुस्सा या नाराज़गी व्यक्त कर सकता है। उस मंच पर अभिव्यक्ति की खुली स्वतंत्रता होती है।

         ये अच्छी बात है कि बीते जमानों की अपेक्षा इस सदी में समाज के हर वर्ग खासकर युवाओं में सोशल मीडिया पर देशभक्ति, मौलिक अधिकार, अभिव्यक्ति की आज़ादी समेत देश की राजनीति, सरकार के अहम फैसलों पर अपनी राय प्रकट करने और उनका समर्थन या विरोध करने का नवाचार हुआ है, लेकिन हम इसके दूसरे पहलू को देखें तो कहीं न कहीं यह नवाचार अपना नकारात्मक और हिंसक रूप लेकर हमारे समाज और युवाओं के लिये अभिशाप भी बनता जा रहा है।

        यदि हम सोशल मीडिया पर एक दिन के लिए प्रोफाईल को तिरंगे में रंगने, किसी जवान के संघर्ष को दूर - दूर तक फैलाने जैसी कसमें (जोर) देने, देशभक्ति से ओत - प्रोत संदेश या वीडियों को प्रचारित करने, दुश्मन देश के प्रति गुस्सा ज़ाहिर करने जैसे आंदोलन चला सकते हैं तो इसी सोशल मीडिया पर हमारे गणतंत्र को अक्षुण्ण बनाए रखने, संविधान में दिए नागरिकों के कर्तव्यों और देश के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारियों के प्रति मुहिम क्यों नहीं चला सकते  हम यह संदेश क्यों नहीं फैला सकते कि हमारी वास्तविक आय के मुताबिक समय पर इनकम टैक्स जमा करना चाहिए, नागरिक अधिकारों की रक्षा करना चाहिए, ट्रैफिक नियमों का पालन करना चाहिए, देश को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए, घूसखोरी - रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार को बंद करने के नायाब और सार्थक तरीके निकालने चाहिए, हमें अपनी नैतिक जिम्मेदारी और ईमानदारी के साथ अपना काम करना चाहिए क्या इस तरह के संदेश देशभक्ति का परिचायक नहीं हो सकते  

           नि:संदेह, सोशल मीडिया न सिर्फ आवाम की आवाज़ बनी है, बल्कि आवाम की जिंदगी तक बन बैठी है। एक ज़माना था, जब संदेश का दूसरा नाम चिट्ठियां होती थी, डाकिये की साईकिल की ट्रिन – ट्रिन कानों में उमंग का रस घोल देती थी, आज उस डाकिये की जगह सोशल मीडिया ने ले ली है। दुनिया के किसी भी कोने में यदि कोई क्रांति या आंदोलन की शुरुआत करना हो, तो सबसे बेहतर मंच फेसबुक होता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सोशल मीडिया ने सारी दुनिया को परिवार के रूप में बांधा है, बल्कि एक छोटे से परिवार के सदस्यों को भी भावनात्मक रूप से मिलाया है।

          एक मिसाल के तौर पर हम देखें कि भारत में खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों में एक बेटा अपने पिता या बड़े भाई से किसी भी बात को कहने में सकुचाहट महसूस करता है, लेकिन पिता या बड़े भाई के जन्मदिन या किसी विशेष अवसर पर अपने दिल की सारी भावनाओं को उड़ेल देने का माध्यम सोशल मीडिया बना है। ये वही माध्यम है जिसके द्वारा हम सारी दुनिया से बातें कर सकते हैं, उनके साथ अपने सुख दुख को साझा कर सकते हैं, लेकिन कहीं न कहीं यह भी प्रतीत होता है कि सारी दुनिया को अपनापन देने के चलते इस क्रांति ने हमें अपनों से दूर भी किया है। ये सौ फीसदी सही है कि कोई भी शख्स किसी अजीज़ के जन्मदिन या खुशी के मौके पर उसके लिए भावनाओं का समन्दर उड़ेल देता है, लेकिन वो सिर्फ एक औपचारिकता भर ही रह पाती है। इस माध्यम से लोगों द्वारा अपनी खुशी या गम को साझा करना एक फैशन सा बन गया है। खासतौर पर युवा वर्ग पर इसका कई दफ़े नकारात्मक असर भी देखने को मिलता है। जिसकी बानगी है कि फेसबुक पर डाली जाने वाली किसी पोस्ट पर मिलने वाले लाइक या कमेंट की गिनती को बार बार गिनने की आदत से बनने वाली नकारात्मकता युवाओं को कहीं न कहीं मानसिक रूप से कमजोर कर रही है।

        बीते दिनों हुए एक सर्वे में तो यह भी पाया गया कि युवा वर्ग में बढ़ रही आत्महत्या, चिड़चिड़ाहट, अकेलापन का प्रमुख कारण उनक ज्यादा देर तक सोशल मीडिया पर बने रहना भी है। नि:संदेह यह अभिव्यक्ति की आज़ादी का बेहतर मंच है, लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी की लक्ष्मण रेखा यहां मौजूद नहीं है। व्यक्ति की निजता की परवाह इस मंच पर दूर की कौड़ी है। यह कहना मुश्किल है कि फेसबुक की स्थापना के मूल उद्देश्य आज भी प्रासंगिक हो, लेकिन भारत के युवा वर्ग का एक बड़ा तबका इसके संस्थापन के उद्देश्यों से अनजान सा लगता है। हां, ये सही है कि सोशल मीडिया ने दिलों को मिलाया है, लेकिन कई दफे दिलों में खलीशें पैदा करने में भी इस माध्यम का अहम योगदान रहा है, जैसे कई जगहों पर होने वाली सांप्रदायिक घटनाओं के पीछे किसी भी छोटी सी बात को बढ़ा - चढाकर सोशल मीडिया पर ट्रेंड बना दिया जाता है। चुनाव हो या कोई तीज – त्यौहार, जन्मदिन हो या कोई शोकसभा, आंदोलन हो या कोई अभियान हर विषयवस्तु के केंद्र में सोशल मीडिया हमेशा से रहा है। वैश्विकरण की इस क्रांति के अपने चरम पर होने के बाद शुरु हुए डिजिटलाइजेशन के इस युग में भारत के गांव भी पीछे नहीं है। ग्रामीणजन भी फेसबुक पर दस्तक देकर अपनी मौजूदगी इस मंच पर दर्ज करा रहे हैं। डिजिटलाइजेशन की तेज चकाचौंध में ग्लोबलाइजेशन (वसुधैव कुटुंबकम) की आशा पर खरा उतर सोशल मीडिया ने चिट्ठियों के चले जाने के दर्द पर मरहम लगाया है।