यह फ़िल्म नहीं, फ़िल्मकार की समीक्षा है...

 

विवेक गुप्ता


भोपाल की ज्योति टॉकीज के उस अँधियारे में परदे की रोशनी दर्शकों के चेहरों पर पड़ रही थी। पूरा हॉल ठहाकों से गूँज रहा था। लोगों के दाँत चमक रहे थे। परदे पर “थ्री ईडियट्स” का “धन = स्तन” वाला दृश्य चल रहा था।

थोड़ा-बहुत हँस तो मैं भी रहा था, पर मैं कुछ हैरान भी था। कारण यह कि जिस घटिया लतीफ़े पर वह दृश्य आधारित था, उसे मैं पहले तीन-चार बार पढ़ चुका था और मेरा ख़्याल था कि अधिकांश लोगों ने उसे पढ़ रखा होगा। फिर भी लोग पेट पकड़-पकड़कर हँस रहे थे।

…लेकिन सब नहीं। मैंने देखा, मुझसे एक पंक्ति आगे बैठी एक लड़की का सिर झुका हुआ था। उसके आसपास बैठे लोग भी असहज थे। शायद वे एक ही परिवार के थे। और ज़ाहिर है, बलात्कार-चमत्कार, स्तन-धन पर कोई सभ्य व्यक्ति कम-से-कम अपने परिवार के साथ तो नहीं हँस सकता।

फूहड़ हरकतों का महिमामंडन, “तोफ़ा” क़ुबूल हो जैसी अश्लीलता और कचरा साफ़ करने वाले वैक्यूम क्लीनर की मदद से प्रसव कराया जाना… साफ़ था कि हीरानी फ़िल्मी मसालों के चक्कर में फँस गए हैं। इस फ़िल्म के बाद मुझे लग गया कि राजकुमार हीरानी ने अपना शिखर अपनी पहली लोकप्रिय फ़िल्म से छू लिया है और अब उन्हें गिरना ही है। और हुआ भी यही।

“मुन्नाभाई एमबीबीएस” वाले फ़िल्मकार ने “संजू” बनाई है। हीरानी के इस सफ़र के लिए ही पतन, अधोगति, गिरावट जैसी संज्ञाएँ हैं। हीरानी का यह पतन चौंकाता नहीं है, क्योंकि यह अचानक नहीं हुआ है। मुन्नाभाई उनका शिखर था और संजू रसातल। इन दोनों के बीच वे क्रमश: गिरते ही गए हैं।

यह सिनेमाई गुणवत्ता, मनोरंजन की क्षमता, लोकप्रियता और कमाई के बारे में नहीं है। यह तय है कि संजू, मुन्नाभाई से दस गुना पैसे कमाएगी और शायद हज़ार करोड़ का रिकॉर्ड भी तोड़ दे।

यह तो फ़िल्मकार के मानसिक स्तर की बात है। यह तो सुनील दत्त जैसे धर्मात्मा के आवारा, नशेड़ी, शराबी, अय्याश, आतंकवादियों से रिश्ते रखने वाले और सज़ायाफ़्ता अपराधी बेटे के जीवन पर फ़िल्म बनाने के बारे में सोचने की बात है।

मैंने कहीं पढ़ा था कि सुनील दत्त हुसैनी ब्राह्मण थे। सातवीं सदी में भारत के सम्राट हर्षवर्धन ने कर्बला के युद्ध में इमाम हुसैन की सहायता करने के लिए अपने सैनिकों का एक दस्ता रवाना किया था। वह दस्ता समय पर नहीं पहुँच पाया, वरना आज इस्लाम का इतिहास कुछ और होता। उसी दस्ते में शामिल सैनिक के वंशज थे, सुनील दत्त।

मैंने तो यहाँ तक पढ़ा है कि सुनील दत्त ने पत्नी नरगिस की मौत के बाद उन्हें इस्लामिक रीति से दफ़नाया और मुसलमानों से माफ़ी माँगी कि मैंने आपके मज़हब की स्त्री से विवाह करके आप लोगों को दु:ख पहुँचाया।

उस सुनील दत्त की औलाद है संजय दत्त, जिसने एके-56 रखने के बारे में अपने बाप के सवाल पर जवाब दिया था मेरी रग़ों में मुस्लिम ख़ून दौड़ रहा है। मुंबई शहर में जो हो रहा था, उसे मैं बरदाश्त नहीं कर सकता था (संदर्भ : तहलका की स्टोरी, बरास्ते बीबीसी)।

राजकुमार हीरानी ने उसी संजय दत्त की जीवनी बनाई है, जो फ़िल्म में बड़े अहंकार से कह रहा है कि मैं 300 महिलाओं के साथ सोया। संजय की कहानी के ज़रिए हीरानी कौन-सा संदेश देना चाहते हैं? निश्चित तौर पर, यह डाकू के संत बनने की कथा तो नहीं कि कोई प्रेरणा मिले। क्या कोई यक़ीन करता है कि जेल जाने के बाद संजय दत्त सुधर गया है?

यह भी ठीक है कि बॉलीवुड के भांडों ने दाऊद इब्राहीम से लेकर गुजराती डॉन तक को महिमामंडित करते हुए फ़िल्में बनाई हैं। लेकिन सबको पता है कि ऐसी फ़िल्में किसके पैसों से और किस तरह के उद्देश्य से बनाई जाती हैं। हीरानी कम-से-कम उस श्रेणी के तो नहीं हैं।

फिर मेरी जिज्ञासा है कि क्या महज़ संजय दत्त के साथ अपने संबंधों के लिए उन्होंने अपनी अब तक की ख्याति और छवि को दाँव पर लगा दिया है? या फिर वे बहक गए हैं… हालाँकि भटक तो वे पहले ही गए थे…

 

(यह लेखक के अपने विचार हैं)