भूखे ही नहीं मरते संसार में...
_____________________

मुरलीधर चांदनीवाला

 

" केवलाघो भवति केवलादी "। जो अकेला खाता है, वह पाप खाता है , इतना उत्तेजक वाक्य देने वाला दानसूक्त ऋग्वेद के महासागर में अलग से पहचान में आता है। इस सूक्त में भिक्षु ऋषि ने उन धनी मित्रों की जमकर भर्त्सना की है ,जो अपनी सुख- सुविधाओं से बाहर निकलने का कष्ट नहीं उठाते। ऋषि प्रशंसा करता है उनकी ,जो अपना यत्किञ्चित् धन भी लुटा देते हैं उन पर ,जो भूखे हैं , याचक हैं , असहाय हैं ।


न वा उ देवा: क्षुधमिद्वधं ददुरुताशितमुप गच्छन्ति मृत्यव:।
उतो रयि: पृणतो नोप दस्यत्युतापृणन्मर्डितारं न विन्दते।। 

___________________________________________
ऋग्वेद : दानसूक्त ,१०.११७.१


भूखे ही नहीं मरते संसार में 
मरते तो वे भी हैं , मित्र ! 
जो पेट भर जीमते रहते हैं अकेले ।
बाँट कर खाते -पीते , तो ठीक था ।
अकेले पेट भरते रहे अपना
तो हुआ क्या? मर तो वे भी रहे हैं ।।१।।

द्वार पर खड़ा भूखा कोई 
मांग रहा दो सूखी रोटी, 
तुम अनदेखा कर बैठे हुए
अपनी थाली सजाकर ।
मुँह में निवाला लेते हुए 
मन में तुम्हारे हुआ नहीं कुछ।।२।।

घर आये याचक को कुछ देते ,
दुर्बल को देते थोड़ी सी शरण,
तो तुम अपने में ही ऊपर उठ जाते ,
निर्वैर भाव से होते अपने ही सहायक।।३।।

वह मित्र कहलाने योग्य नहीं
जो सुख-दु:ख में साथ नहीं होता ।
उसका घर तो घर ही नहीं ,
साथ दे ,तो पराया भी अपना है।४।।

'ना' बोलने से पहले
देख लो जीवन का लम्बा पथ ।
धन तो रथ के चक्र की तरह
आता, जाता ऊपर-नीचे ।
आज है तुम्हारे पास 
चला जायेगा कल कहीं और।।५।।

व्यर्थ है अन्न के भंडार ,
सच कहता हूँ , 
जमाखोरी ही तुम्हारी मृत्यु है।
न राजा के काम आये तुम ,न अपनों के।
अकेले खाने वाले तुम
पाप ही खाते रहे जीवन भर।।६।।

भूमि को जोतते हुए हल की लकड़ी 
अच्छी है पड़ी हुई लकड़ियों से ,
अपने पाँव चलता हुआ पथिक
अच्छा है सोये हुए लोगों से ,
ज्ञानी अच्छा है अज्ञानियों से ,
उदार निर्धन अच्छा है अनुदार धनी से।।७।।

थोड़े धन वाला देता है दोनों हाथों से
उससे कुछ बड़ा धनी 
खींच लेता है हाथ कभी- कभी ,
बड़े सम्पत्तिशाली मुट्ठी बाँधे हुए 
देखते रह जाते 
विशालहृदयों के उदार चरित।।८।।

दोनों हाथ एक जैसे नहीं होते,
दाहिने हाथ की जगह
बायाँ हाथ नहीं ले पाता।
एक ही धेनु की बछियाएँ
एक जैसा दूध नहीं देती बड़ी होकर ,
जुड़वाँ बच्चे एक जैसे नहीं होते,
सबकी वृत्तियाँ होती हैं अलग-अलग,
भावनाएँ भी अलग- अलग ।।९।।

No automatic alt text available.