अगर आप टीवी पर न्यूज़ देखते हैं तो इसे पढ़ें और अगर नहीं देखते तो इसे ज़रूर पढ़ें...

 

विवेक गुप्ता


वह बारिश का ऐसा ही एक दिन था। आसमान में बादल घिर आए थे, पर बरस नहीं रहे थे। उन दिनों मैं एक दुमंज़िला मकान की लंबी-चौड़ी छत पर बने एकमात्र कमरे में अकेला रहा करता था।

उस दिन दफ़्तर में “विश्व की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ” नामक पुस्तक मेरे हाथ लगी थी और उसे इत्मीनान से पढ़ने की चाह लिए मैं अपेक्षाकृत जल्दी लौट आया था।

किताब दुनियाभर के जाने-माने लेखकों की कहानियों का संकलन थी। चेख़व, मोपासाँ जैसे कुछ नाम जाने-पहचाने थे, तो कुछ नितांत अपिरिचत भी थे। ऐसे ही एक अनजान लेखक की कहानी मैंने बेमन से पढ़नी शुरू की।

कहानी अच्छी थी, उत्सुकता बनाकर चल रही थी, लेकिन… लेकिन असल धमाका हुआ अंत में। उसका अंत इतना अप्रत्याशित था कि मैं कुर्सी से उछल पड़ा। यहाँ “कुर्सी से उछलना” महज़ एक मुहावरा नहीं है, बल्कि मैं वाक़ई उछल पड़ा था और कमरे से बाहर आकर रोमांच और उत्तेजना के मारे छत पर दौड़ रहा था।

वह ओ. हेनरी से मेरी पहली “मुलाक़ात” थी। वह दिन था और आज का दिन है, ओ. हेनरी मेरे सर्वप्रिय लेखक हैं। उनकी किसी कहानी ने मुझे निराश नहीं किया। ज़ाहिर है, वे ऐसे ही दुनिया में सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले तीन लेखकों में शुमार नहीं होते।

इस यादगार मुलाक़ात के बरसों बाद, हाल ही में मेरा परिचय हुआ श्री ब्रजेश राजपूत से। जी हाँ, इस बार भी लेखक से सीधे नहीं, उसकी किताब के माध्यम से मुलाक़ात हुई। और उनकी पुस्तक “ऑफ़ द स्क्रीन; टीवी रिपोर्टिंग की कहानियाँ” पढ़ते हुए मैं एक बार फिर हेनरी की तरह के एहसासों से गुज़रा।

इस बार अंतर सिर्फ़ यह था कि किताब का पहला लेख पढ़ते हुए मैं कुर्सी से चिपक गया। किताब की पहली स्टोरी है- “हरदा से आई हादसे की ख़बर”। यह आधी रात को नदी में ट्रेन गिरने की सूचना से शुरू होती है और टीवी पर इस ख़बर के प्रसारित होने के बाद ख़त्म होती है।

क़रीब चार पृष्ठों के इस लेख में चालीस उतार-चढ़ाव होंगे। दुर्घटना स्थल पर पहुँचने से लेकर रिपोर्ट बनाने और वहीं से भेजने तक की क़वायद में हर पल हालात ऐसे बदलते रहते हैं कि पाठक भी आशा, निराशा, चिंता और सुकून की लहरों में डूबता-उतराता रहता है।

गुणी पत्रकार रशीद क़िदवई कहते हैं कि ब्रजेश के लेखों को पढ़ते हुए आप देखते और सुनते भी हैं। बतौर पाठक मैं कह सकता हूँ कि क़िदवई जी ने बिल्कुल सच कहा है। किताब के 75 में से ज़्यादातर लेख रोमांचक खोज यात्राओं की तरह हैं, जिनमें आप रिपोर्टर के साथ-साथ चलते हैं।

ब्रजेश शब्दों से माहौल का चित्र खींचते हैं, जिसके चलते कभी आप भय के मारे सिहर उठते हैं, कभी भूतों से मुलाक़ात की संभावना मात्र से रोमांच से भर उठते हैं, कभी मौत से सामना होने पर आपकी जान हलक़ में अटक जाती है, तो कभी असहनीय दुर्गंध से गुज़रते हुए आपको उबकाई आने लगती है। कभी-कभी आपका बड़ा सम्मान होता है और कभी लोग आपके सामने ही आपकी बुराई कर रहे होते हैं।

टीवी न्यूज़ की दुनिया में आपका स्वागत है!

वही टीवी न्यूज़, जिसे “घटिया” कहकर हम कई बार नकार देते हैं और चैनल बदलकर “आतंक का गुंडाराज” जैसी किसी दक्षिण भारतीय डब फ़िल्म की तरफ़ बढ़ जाते हैं। मैंने भी लंबे समय से टीवी पर समाचार देखना छोड़ रखा है।

मुझे तो टीवी रिपोर्टरों से और भी ज़्यादा शिकायतें थीं/ हैं। मुझ जैसे हिन्दी-भक्त को टीवी की भ्रष्ट भाषा हज़म ही नहीं होती। इसके अलावा, एक “सौतिया डाह” क़िस्म की चीज़ भी होती है। ख़बरों की दुनिया के ही हिस्से होने के बावजूद प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दो ध्रुवों की तरह हैं। प्रिंट वालों को लगता है कि टीवी वालों का काम नौटंकी की तरह निरर्थक है और टीवी वालों को लगता है कि छपे हुए को आजकल पढ़ता ही कौन है, सो छापना ही व्यर्थ है!

सच कहूँ, तो ज़्यादातर टीवी रिपोर्टर मुझे “बेवकूफ़” लगते थे। ध्यान दें, मैं “हैं” नहीं “थे” कह रहा हूँ। “ऑफ़ द स्क्रीन” पढ़ने के बाद मेरी यह धारणा बदली है। ब्रजेश की लेखनी में दोहराव नहीं है, वे व्यर्थ का विस्तार नहीं करते, अनावश्यक भूमिकाएँ नहीं बाँधते और बिना लाग-लपेट सबकुछ कह देते हैं।

मेरा ख़्याल है कि ब्रजेश “आस्तीक” की तरह हैं। महाभारत ख़त्म होने के बाद, कलियुग के आरंभ में आस्तीक एक ऋषि थे। उनके पिता मानव और माता नागकन्या थीं। जब अर्जुन के प्रपौत्र जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्पयज्ञ करके तक्षक समेत सभी सर्पों का समूल नाश कर देना चाहा, तो आस्तीक ने मध्यस्थ बनकर नागों की रक्षा की थी।

ब्रजेश में भी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, दोनों के गुण हैं। उनकी भाषा प्रिंट वाली है, तो शैली टीवी की। वे लेखन में गंभीर टिप्पणियाँ करते हैं, तो उसे टीवी वालों की तरह चुटीला अंदाज़ भी देते हैं। यानी उन्होंने अपने लेखन से न केवल टीवी रिपोर्टरों की छवि को “मटियामेट” होने से बचा लिया है, बल्कि उसे एक हद तक सँवारा भी है।

बहरहाल, “ऑफ़ द स्क्रीन” ने मेरी कुछ और ग़लतफ़हमियाँ भी तोड़ी हैं। ख़ासतौर पर हल्की-फुल्की स्टोरीज़ को लेकर। किताब की एक स्टोरी- “टीवी में नॉन न्यूज़ भी न्यूज़ होती है, ज़रा समझा करो” पढ़कर सचमुच समझ में आया कि निरर्थक लगने वाली ख़बर भी किस तरह पब्लिक डिमांड और ऊपर के दबाव में बनानी पड़ती है और उस आसान-सी स्टोरी के लिए भी कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं।

किताब में नर्मदा में तैरते शिवराज सिंह चौहान हैं और फटी टी-शर्ट वाले “महाराजा” ज्योतिरादित्य सिंधिया भी। इसमें झाड़ियों में फँसी एक नवजात बच्ची की दिल को छू लेने वाली कहानी है, एक चर्चित एक्टिविस्ट का हत्याकांड है और उत्तराखंड की भीषण आपदा भी है। यहाँ चुनावी क़िस्से हैं और अधिकारियों के खटकरम भी। बीच-बीच में कुछ सकारात्मक कहानियाँ भी हैं। आपने अब तक टीवी पर जितनी तरह की न्यूज़ स्टोरीज़ देखी होंगी, लगभग सब इसमें हैं।

मेरी सलाह है कि यदि आप टीवी न्यूज़ देखते हैं, तो इसे पढ़ें… और अगर नहीं देखते, तो इसे ज़रूर पढ़ें। दोनों ही स्थितियों में आपका नज़रिया काफ़ी हद तक बदल जाएगा।

पाठक को बाँधकर रखने के अलावा, यह लेखक की एक और बड़ी ख़ूबी है।

 

पुस्तक : ऑफ़ द स्क्रीन; टीवी रिपोर्टिंग की कहानियाँ
लेखक : श्री ब्रजेश राजपूत
प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस, भोपाल
मूल्य : 250 रुपए