विष्णु की वीरगाथा
 

वैदिक विष्णु का स्वरूप पुराणों में बताये गये विष्णु से पूरी तरह भिन्न है। न शंख,न चक्र,न गदा,न पद्म। रुद्र की तरह शक्तिशाली और विशाल। समस्त लोकों को अपनी विशालता में समेटने वाले विष्णु के परमपद से मधु का झरना बहता है। बाद के गाथाशास्त्र से मुक्ति पाये बिना विष्णु के मूल तक पहुँच पाना सम्भव नहीं । ऋग्वेद के प्रथम मंडल के प्रसिद्ध विष्णु सूक्त की मात्र छ: ऋचाओं में इस विश्वव्यापी देव के तीन पदों की महिमा का सुंदर वर्णन है ।

विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं य: पार्थिवानि विममे रजांसि।
यो अस्कभायदुत्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधारुगाय :।।

 

मुरलीधर चॉंदनीवाला
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ऋग्वेद : विष्णु सूक्त, १.१५४. १


मैं विष्णु की वीरगाथा कहता हूँ ।
वह विष्णु ही है जिसने
पार्थिव लोकों को बनाया ,
उसकी गति में विशालता है ,
विष्णु के तीन चरणों में 
समाये हुए हैं तीनों लोक ,
उसने थाम रखा है
आनंद के उस परमपद को
जहाँ पहुँचना चाहती हैं 
हमारी आत्माएँ ।।१।।

आनंद के लोक को
स्थापित किया 
विष्णु ने अपने पराक्रम से,
वह भयंकर सिंह के समान
घूम रहा है दुर्गम पहाड़ की 
सबसे ऊँची चोटी पर ,
विष्णु की तीन विशाल गतियों में 
रहते हैं सारे भुवन।।२।।

विष्णु के प्रति 
हमारे कर्म और विचार 
निवेदित हों।
ऊँचे शिखर पर खड़ा विष्णु 
विशाल गति वाले वृषभ की तरह
दिखाई देता है , 
उसने अकेले ही माप लिया 
अपने तीन पदों में 
लम्बा-चौड़ा परमधाम।।३।।

जहाँ- जहाँ विष्णु ने
अपने पाँव रखे ,
वहाँ- वहाँ अक्षय मधु से
भरे हुए कूप हैं ।
नित्य आनंद में मग्न है विष्णु ,
उसने अकेले ही धारण किया 
त्रिधातुओं को ,पृथ्वी को , द्युलोक को
और समस्त भुवनों को।।४।।

हम तुम्हारे पथ पर
लय हो जाना चाहते हैं , विष्णु ! 
हम डूबना चाहते हैं उस आनंद में 
जहाँ देवत्व की अभीप्सा वाली 
आत्माएं विहार करती हैं ।
हे विशाल गति वाले विष्णु ! 
तुम्हारे परमधाम में है
मधु का वह उत्स
जो हमारा बन्धु है ,
हमारा सखा है।।५।।

हे विष्णु ! 
हम उस लोक में 
आना चाहते हैं , 
जहाँ भूरिश्रृंगा गायें 
प्रकाश को लेकर पहुँचती हैं ।
हे विराट ! उसी लोक से
तुम्हारा दिव्य प्रकाश
इस धरती पर उतरता है ।।६।।