सफ़र के साथ

 

मीनाक्षी दुबे

अँगुली थामे,
डगमग कदम
बदल गये ,
दृढ़ कदमों में 
किलकारी भरते, 
सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते
दो चोटी बाँधे,
चुलबुली लड़की
बदल गई, दृढ़ स्त्री में

झाँक रही अपना अतीत,
देख रही चलचित्र सा
कब बन गई, किसी की प्रिया
गृहिणी, माँ ,मार्गदर्शिका
एक समर्पित सेविका
साकारती अपनों के सपने
सँवारती अपनों का जीवन 
पंख देती नन्ही उड़ान को।

अतीत के उस विस्तार में
कहाँ नहीं थी वह... . 
डटी रही थी हर मोर्चे पर।
आज खडी़ है
स्त्रीत्व के ठोस धरातल पर

कर्तव्यों का सफर,नहीं हुआ है खतम
बैठी है, प्रसूतिगृह के दरवाजे पर
तक रही है राह, 
बेटी के नवजात के आगमन की।

थामने को तैयार ,
कोमल किसलय से 
नवजीवन को।
फिर वही डगमग कदम
थामते हाथ
कोमल अँगुलियों की छुअन...