रंगरसिया...

सुशोभित सिंह सक्तावत

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मैंने उससे पूछा, आज क्‍या पहना है तुमने? उसने कहा, तुम्हारी कल्‍पनाओं का पश्‍मीना! मैंने कहा, इतना झीना लिबास पहनना ठीक नहीं!

वह लजाकर मुस्‍कराई होगी। मैंने कल्‍पना में देखी : उसके कपोलों की ललाई।

मैंने कहा, सुनो तुम्‍हारे लिए एक बैंजनी चूनर ली है, अंगुलभर चौड़ी रेख वाली लहरिया। ज़रा देखो तो ओढ़कर।

उसने कहा, बैंजनी झांई से देह ताम्‍बई पड़ जाए मेरी तो फिर मत कहना!

अ‍बकी मैं मुस्‍कराया!

मैंने कहा, इतनी देर तलक आकाश में झांकने का मतलब? नील उतर आया है आंखों में।

उसने कहा, सच्‍ची? मुझे तो लगता था मेरी आंखों के बाहर कोई आसमान नहीं!

और तब, कल्पना में देखा मैंने : धनक के फूल-सा लालसा का कनेर, उसकी नीली आंखों में।

मैंने उससे कहा, हरे में स्‍याह घुल जाए तो काही रंगत होती है, तुम पर ख़ूब फबेगी काही रंग की कुर्ती।

उसने कहा, काही पनीला पड़ जाए तो धानी हो जाती है रंगत। मैं तो लूंगी धानी दुपट्टा ही।

मैंने कहा, इतनी सुर्ख़ लाली क्‍या अच्‍छी लगती है होंठों पर?

उसने कहा, पलछिन में कत्‍थई पड़ जाएंगे गुलाब जो निमिषभर और सीझे ताप में।

मैंने कहा, कपासी सलवार और कुसुम्भी कुर्ती पहनकर कभी-कभी हरसिंगार सरीखी लगती हो तुम।

उसने कहा, आधी रात हरसिंगार के फूलों की बरखा कभी देखी है तुमने?

मैंने कहा, तीतरबानी मौसम है। उसने पहन ली - सुग्‍गापंखी सलवार। 
मैंने कहा, किरमिज़ी करवट है। उसने पहन लिया - सुर्ख़ाबी लहंगा।

मैं रंगरेज़ था, उसका रंगरसिया।
और वो : मेरी र‍सप्रिया !

 

चित्रकृति : सुब्रत धर