सब मनिजा मोर परजा कहते हुए निकलेंगे जगन्नाथ

 

पण्डित योगेश "शास्त्री"

                   राजा महाराजाओ द्वारा अपनी प्रजा के हाल जानने की परंपरा बहुत ही प्राचीन रही है। इसी संदर्भ में एक वाक्य कहा जाता है "सब मनिजा मोर परजा"(समस्त मनुष्य मेरी प्रजा है। यह कथन है भगवान जगन्नाथ का। अपनी प्रजा का हाल जानने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान जगन्नाथ आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को रथयात्रा करते हुए अपने निवास से निकलते हैं,यह रथयात्रा पुरी का प्रधान पर्व है।
                    पुराणानुसार रथयात्रा माता सुभद्रा की द्वारिका भ्रमण की इच्छा पूर्ण करने के उद्देश्य से भगवान श्री कृष्ण और भगवान बलराम ने अलग-अलग रथों में बैठकर करवाई थी, माता सुभद्रा की नगर भ्रमण स्मृति में यह यात्रा प्रतिवर्ष निकाली जाती है। स्कंद पुराण में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि रथयात्रा के दिन जो भी व्यक्ति श्री जगन्नाथ जी का दर्शन करते हुए प्रणाम करते हैं, वह पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है। जो भी व्यक्ति भगवान के रथ खींचने में सहयोग प्रदान करते हैं, वह समस्त पापों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं। इसी कामना को पूर्ण करने के लिए अनेको लोग रथ यात्रा में शामिल होकर भगवान का रथ खींचने में अपना सहयोग प्रदान करते हैं और समस्त पापो दुखो से छूट मोक्ष को प्राप्त होते है। भगवान जगन्नाथ पूर्ण पुरुषोत्तम हैं, उनके अनेक नाम हैं उनमें ही भगवान श्री राम, श्री कृष्ण,बुद्ध, महायान का शून्य और अद्वैत का ब्रह्म समाहित है ।

 


                       

                   समस्त जगत के पालनहारी भगवान विष्णु को माना जाता है पृथ्वी लोक पर समस्त जगत के स्वामी और दर्शन मात्र से मोक्ष के प्रदाता भगवान जगन्नाथ है,धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान कृष्ण के स्वलोक गमन के बाद(क्योंकि प्रभु भूलोक पर मनुष्य स्वरूप में लीला करने आए थे) अर्जुन द्वारा उनका अग्निमुख किया गया किंतु समस्त शरीर के समाप्त होने के बाद भी दिल अर्थात पिंड जलता रहा। मान्यता है भगवान् ब्रह्मा श्री कृष्ण के नश्वर शरीर में विराजमान थे, ईश्वर की आज्ञा अनुसार पांडवों ने पिंड को जल में प्रवाहित कर दिया । भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न के माध्यम से राजा इद्रधुम्न को उस पिंड की सूचना दी। राजा इंद्रधुम्न ने उस जगह पर पहुंचकर पिंड को प्राप्त किया, जो लट्ठे का स्वरुप प्राप्त कर चुका था। उसी समय एक ब्राह्मण ने राजा इंद्रद्युम्न से उस लट्ठे से स्वयं के द्वारा मूर्ति बनाने की  इच्छा जाहिर की किन्तु उसकी शर्त थी कि वह मूर्ति अकेले में एक कमरे में बनाएंगे यदि कोई उसे बीच में देखता या रोकता है तो वह कार्य अधूरा छोड़ कर चला जाएगा। राजा ने उसकी शर्त स्वीकार कर एक कमरा दे दिया जिसमें ब्राह्मण ने मूर्ति बनाने का कार्य प्रारम्भ किया। 6 दिन बीत जाने पर अंदर से बेहद शांति पूर्ण वातावरण पाकर राजा के मन में ब्राह्मण को लेकर चिंता हुई, उन्होने द्वार खुलवा दिए और पाया कि शर्त अनुसार ब्राह्मण कार्य अधूरा छोड़ गायब था। तब राजा ने जाना की वह और कोई नही देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा थे। राजा को बहुत ग्लानि हुई किन्तु देवऋषी नारद ने पुनः ब्राह्मण का रूप धारण कर राजा को यह बताया कि सब प्रभु की इच्छा से ही हुआ है तब राजा ने वही पर मूर्तियों की स्थापना की ।

 


                     

                    बहुत आश्चर्य भरी बात यह भी है प्रत्येक 12 वर्षों में मूर्तियां बदली जाती हैं किंतु उस दिल के लठ्ठे को किसी ने नहीं देखा। प्रतिष्ठा करने वाले ब्राह्मण भी आंखों पर पट्टी बांधकर कर्म करते हैं केवल लट्ठे को ब्राह्मणों द्वारा महसूस किया गया है, जिसे वह बहुत ही सुकोमल बताते हैं लेकिन उसे कभी देखा नहीं है


इस वर्ष श्री जगन्नाथ रथ यात्रा का आरम्भ 14 जुलाई को हो रहा है, जो कि पुरी सहित देश के अन्य भागों में भी उत्साह के साथ यह उत्सव मनाया जाएगा ।

जय जगन्नाथ ।।